मुझे हांसिल मुकद्दर से नही था
मेरा रिशता समंदर से नही था
मैं था बाहर से बिल्कुल साफ-सुथरा
मगर मैं साफ अन्दर से नही था
मेरे मन में तो कोई और रहता,
मैं खुश था तेरे बिस्तर से नही था
कहीं उसको अंधेरा खा न जाये,
यहाँ सूरज इसी डर से नहीं था
लहू तो लाल था मेरी रगों में,
अगरचे मैं बडे घर से नहीं था
सूबे सिहं सुजान
Saturday, July 9, 2011
गजल
एक तस्वीर जिन्दगी की है
ये गजल पूरे आदमी की है
शाम से कुछ उदास हैं आँखे,
आज फिर याद अजनबी की है
मैं जिसे पूजता नहीं थकता,
मंदिरों में कमी उसी की है
दूसरों के चराग बुझा उसने,
अपने घर में यूँ रोशनी की है
चाँद पर आदमी गया जबसे,
कुछ तो मन्दम सी चाँदनी की है
दिनांक- 1.10.2000 सूबे सिहं सुजान
ये गजल पूरे आदमी की है
शाम से कुछ उदास हैं आँखे,
आज फिर याद अजनबी की है
मैं जिसे पूजता नहीं थकता,
मंदिरों में कमी उसी की है
दूसरों के चराग बुझा उसने,
अपने घर में यूँ रोशनी की है
चाँद पर आदमी गया जबसे,
कुछ तो मन्दम सी चाँदनी की है
दिनांक- 1.10.2000 सूबे सिहं सुजान
Thursday, July 7, 2011
बरसात
यहाँ बरसात नही, वहाँ बरसात है
ये कैसी घटना-घटी मेरे साथ है...
मेरे हाथों में कोई हाथ नही है,
उसके हाथों में हाथ ही हाथ है.....
सुजान.....................
ये कैसी घटना-घटी मेरे साथ है...
मेरे हाथों में कोई हाथ नही है,
उसके हाथों में हाथ ही हाथ है.....
सुजान.....................
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