Saturday, July 9, 2011

गजल

मुझे हांसिल मुकद्दर से नही था
मेरा रिशता समंदर से नही था
मैं था बाहर से बिल्कुल साफ-सुथरा
मगर मैं साफ अन्दर से नही था
मेरे मन में तो कोई और रहता,
मैं खुश था तेरे बिस्तर से नही था
कहीं उसको अंधेरा खा न जाये,
यहाँ सूरज इसी डर से नहीं था
लहू तो लाल था मेरी रगों में,
अगरचे मैं बडे घर से नहीं था
                                       सूबे सिहं सुजान

गजल

एक तस्वीर जिन्दगी की है
ये गजल पूरे आदमी की है
शाम से कुछ उदास हैं आँखे,
आज फिर याद अजनबी की है
मैं जिसे पूजता नहीं थकता,
मंदिरों में कमी उसी की है
दूसरों के चराग बुझा उसने,
अपने घर में यूँ रोशनी की है
चाँद पर आदमी गया जबसे,
कुछ तो मन्दम सी चाँदनी की है

दिनांक- 1.10.2000                 सूबे सिहं सुजान

Thursday, July 7, 2011

बरसात

यहाँ बरसात नही, वहाँ बरसात है
ये कैसी घटना-घटी मेरे साथ  है...
मेरे हाथों में कोई हाथ नही है,
उसके हाथों में हाथ ही हाथ है.....
                             सुजान.....................

Sunday, July 3, 2011

रूबाई

दृढ पत्थर जलधार बदल देते हैं
मेहनतकश संसार बदल देते हैं
जो लोग कठिन कार्य को करते हैं,
वह जीवन आधार बदल देते हैं....
सूबे सिहं सुजान

गजल

सुबह हो रही है
जीवन जाग रहा है
आगे-आगे भाग रहा है
सतह हो रही है.....

मेरे मन में भाव जगे हैं
भावनाओं के हुये जगमगे हैं
फतह हो रही है......

.सूबे सिहं सुजान

गजल

जो बुरे हों सफल नही होते
लोग अच्छे विफल नही होते
जिनका सुख हम भुला नही पाते,
काम ऐसे सरल नही होते     ..सुजान